टिहरी/देहरादून: उत्तराखंड सरकार इन दिनों अपनी “जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वारा” मुहिम का जोर-शोर से प्रचार कर रही है। सरकारी मंचों से ₹50 की सेवाओं को बड़ी उपलब्धि बताकर पेश किया जा रहा है, लेकिन क्या जमीनी हकीकत भी उतनी ही सुनहरी है? आज उत्तराखंड का आम नागरिक सरकार से सवाल पूछ रहा है कि क्या यह वास्तव में सेवा है या फिर 2027 के चुनाव से पहले जनता को भ्रमित करने की एक सोची-समझी राजनीति?
CSC केंद्रों का काम, मंचों पर प्रचार
सरकार जिन सेवाओं का ढिंढोरा पीट रही है, वे सभी काम प्रदेश के दूर-दराज के गांवों में स्थित सीएससी (CSC) सेंटरों के माध्यम से पहले से ही हो रहे हैं। ₹50 के कामों के लिए करोड़ों का विज्ञापन और बड़े-बड़े मंच सजाना जनता की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है?
पहाड़ों में खौफ: बाघ और भालू का आतंक
आज पहाड़ों का सबसे बड़ा मुद्दा बिजली-पानी से भी ज्यादा ‘सुरक्षा’ बन गया है। उत्तराखंड के पहाड़ों में बाघ और भालू का आतंक इस कदर है कि लोग अपने ही आंगन में सुरक्षित नहीं हैं।
- आए दिन मासूम बच्चे और बुजुर्ग अपनी जान गंवा रहे हैं।
- शाम होते ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता है।
- खेती-बाड़ी चौपट हो रही है क्योंकि लोग जंगलों या खेतों में जाने से डर रहे हैं।
विडंबना देखिए, जहाँ जनता अपनी जान बचाने की गुहार लगा रही है, वहीं सरकार प्रदर्शनी (Exhibition) और फोटो खिंचवाने में व्यस्त है। सरकार का पूरा ध्यान असली मुद्दों से हटकर सिर्फ ब्रांडिंग पर टिका है।
2027 में मिलेगा जवाब?
जनता के बीच इस उपेक्षा को लेकर भारी आक्रोश है। लोग अब खुलकर कहने लगे हैं कि अगर यही हाल रहा—अगर गांवों की सुरक्षा और वन्यजीवों के आतंक का समाधान नहीं निकला—तो 2027 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगना मुश्किल होगा।
अब फैसला उत्तराखंड की जनता के हाथ में है कि उन्हें दिखावे की तालियों के साथ खड़ा होना है या अपने हक और सच के साथ।




