गेंवली गांवऔर स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी जी

इंद्रमणि बडोनी, जिन्हें “उत्तराखंड के गांधी” के रूप में भी जाना जाता है, का जन्म 24 दिसंबर, 1925  को टिहरी गढ़वाल की रियासत के अखोड़ी गांव में हुआ था। उनकी माता श्रीमती कलदी देवीऔर उनके पिता श्री सुरेशानंद थे। उन्होंने नैनीताल और देहरादून में शिक्षा पूरी की है। उन्होंने 1949 में डीएवीपीजी कॉलेज, देहरादून से स्नातक की डिग्री भी पूरी की।  उन्होंने सुरजी देवी से शादी की जब वे केवल 19 वर्ष के थे और आजीविका की तलाश में बंबई चले गए। हालाँकि, वह जल्द ही लौट आया। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत 1953 में की जब एक गांधीवादी कार्यकर्ता मीरा बहन ने उनके गांव का दौरा किया।

मीरा बहन, जिनका वास्तविक नाम मैडलिन स्लेड (Madeleine Slade) था, महात्मा गांधी की अत्यंत निकट और समर्पित शिष्या थीं। वे मूल रूप से ब्रिटेन से थीं, लेकिन गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भारत की सेवा और गांधीवादी विचारधारा को समर्पित कर दिया।

🌿 जीवन और योगदान

  • महात्मा गांधी को “बापू” कहकर संबोधित करती थीं
  • उन्होंने सादगी, ब्रह्मचर्य और आश्रम जीवन को अपनाया
  • स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई
  • कई बार जेल भी गईं
  • पहाड़ी क्षेत्रों, विशेषकर उत्तराखंड, में रचनात्मक और सामाजिक कार्य किए

🏔️ उत्तराखंड से संबंध

मीरा बहन ने उत्तराखंड (तत्कालीन गढ़वाल-कुमाऊँ क्षेत्र) में रहकर

  • ग्रामीण उत्थान
  • पर्यावरण संरक्षण
  • शिक्षा और स्वावलंबन
    पर महत्वपूर्ण कार्य किए।
    1953 में उनके गांव आगमन ने ही इंद्रमणि बडोनी जैसे युवाओं को जनसेवा और आंदोलन के मार्ग पर प्रेरित किया।

🕊️ ऐतिहासिक महत्व

मीरा बहन केवल गांधी जी की शिष्या नहीं थीं, बल्कि वे पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु, अहिंसा की जीवंत प्रतीक, और भारत की आत्मा को समझने वाली विदेशी साधिका थीं।

गेंवली गांव

गेंवली गांव (टिहरी गढ़वाल) का नाम उत्तराखंड के गांधीवादी इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है | गोपाल आश्रम, ग्राम गवली की स्थापना मीरा बहन ने की थी क्योंकि यहीं के क्षेत्र में मीरा बहन का प्रभाव पहुँचा और उन्होंने स्थानीय युवाओं को सेवा, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर प्रेरित किया।

🌿 मीरा बहन का गेंवली से संबंध

  • मीरा बहन गांव और पशु की सेवा करना चाहती थी इसी खोज में उन्होंने 200 मील यात्रा की. खोज करते हुए उन्हें टिहरी से 28 मील दूर भिलंगना नदी के ऊपर चीड़ व देवदार के जंगल में गेंवली पसंद आई. वन विभाग ने उनको दो नाली जगह लीज़ पर दी. यहाँ पर उन्होंने ‘गोपाल आश्रम’ बनाया. उन दिनों देश में सामुदायिक ग्रामीण विकास योजनायें शुरू की जा रहीं थीं. उन्होनें नेहरु जी से विचार विमर्श कर भिलंगना घाटी में काम की योजना बनाई पर नौकरशाही के लचर व्यवहार से ऊब उन्होंने गोपाल आश्रम छोड़ने का मन बना लिया. इस बीच उन्होंने ‘बापू राज’ पत्रिका मई 1952 से शुरू की पर उसे स्वावलंबी न बना पाने के कारण बंद करना पड़ा. वह 1954 से 1956 के बीच गोपाल आश्रम को छोड़ कश्मीर चली गई

🕊️ ऐतिहासिक प्रभाव

  • मीरा बहन की गांधीवादी सोच से प्रभावित होकर इसी क्षेत्र के युवाओं में सामाजिक चेतना जागी।
  • आगे चलकर यही चेतना इंद्रमणि बडोनी जैसे नेताओं के माध्यम से उत्तराखंड राज्य आंदोलन की नैतिक नींव बनी।
  • गेंवली गांव को आज भी गांधीवादी विचारधारा से जुड़े प्रेरणास्थल के रूप में देखा जाता है।

✨ निष्कर्ष

गेंवली गांव और मीरा बहन का संबंध प्रत्यक्ष निवास का नहीं, बल्कि
👉 विचारों, प्रेरणा और जनचेतना का है—जिसने पहाड़ों में अहिंसक संघर्ष और जनसेवा की परंपरा को मजबूत किया।

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